आज एक मिस्टेक हो गयी, वो तो चलो हर रोज़ होती होगीं लेकिन आज वाली तो दिल को छू गयी, आज भी हमेशा की तरह ऑफिस को आ रहा था बिन कुछ खाये , तो एक क्रीमरोल्ल पेस्ट्रीज बेचने वाली आदमी साइकिल पे जा रहा था , जैसे ही मैंने उससे देखा तो अपना साइकिल उस के आगे रोक कर पूछा क ''क्रीम रोल है?'' उसने हाँ में इशारा किया मैंने इशारा किया क खिला दो एक, मीठे का तो मैं बचपन से ही शौक़ीन हूँ , तो वो भाईसाहब ने साइकिल रोका और अपना क्रीम रोल वाला डिब्बा खोला और एक मस्त सा क्रीम से लबा लब रोल मेरे हाथ में थमा दिया , मैंने दस रुपये का नोट उसके हाथ में थमाया और उसने पांच रुपये मुझे वापिस कर दिए और मैं बहुत खुश क भाई कौनसे ज़माने का ये इंसान है जो पांच रुपये का क्रीम से लबा लब रोल दे है , चलो अपने को क्या है, मैंने पांच रुपये जेब में डाले और सामने देखा इक इंसान पेड़ के नीचे बैठा बड़े गौर से मुझे क्रीम रोल खरीदते देख रहा था , कपड़ो से क्या वो निगाहों से ही साफ़ ज़ाहिर कर रहा था के वो भूखा है , जाने क्या हुआ मुझे मैंने उसको पूछा ''हाँ?'' मतलब मैंने कोशिश तो यही की, उसको पुछु अगर उसको भी खाना हो तो , वो सिर्फ देखता रहा , बोला कुछ नहीं मैंने सोचा ठीक है, नहीं तो न सही , मत खाओ , साइकिल के पेंडल पर पाँव रखा और चल दिया , लेकिन वो सिर्फ देखता रहा मेरी तरफ़ , जैसे उसकी निगाहें साफ़ साफ़ कह रही हों मुझसे , भाई दे दो कुछ खाने को , लेकिन मै ठहरा खुदगर्ज़ इंसान , कहाँ इतना सोचता हूँ किसी क वास्ते , चल दिया
क्या हो गया यार आज मुझसे , आज तो पैसे भी थे , मैं क्यों न चला गया उस आदमी क पास खुद उससे क्रीम रोल देने , जल्दबाज़ी से फैसला ले लिया , साइकिल चलाते चलाते एक मिनट बाद आया ये ख्याल, रास्ते में पीछे मुड़ के भी देखा , लेकिन क्या फायदा अब
आ गया फिर ऑफिस यही सोचते सोचते क मिस्टेक हो गया आज